हँसते ज़ख़्म (1)

alone man गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…

उन्हें भूल पाना अब मुमकिन नहीं ,

के ये कोमल एहसास ही…साँसों का सहारा बन गया ;

साहिलों से नाता टूटे ज़माना हो चला,

के उफनते इस सागर में…ये तिनका ही किनारा  बन गया ||

⊗ ⊗ ⊗

कभी डूबते का सहारा हुआ करते थे,

पर अपनी ही कश्ती में शायद छेद था ;

सोचते थे…की मुट्ठी में सारा जहाँ लिए बैठे हैं,

जाने कब फिसल गया हाथों से…वो केवल रेत था ||

⊗ ⊗ ⊗

आँसुओं को यूँ बदनाम न कर,

के मायूस दिल को इन्हीं से क़रार आता है ;

पलकों के बाँध तले छुपाता है हर ग़म,

और छलक भर जायें…तो दिल हल्का हो जाता है ||

⊗ ⊗ ⊗

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2 thoughts on “हँसते ज़ख़्म (1)

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