हँसते ज़ख़्म (2)

alone man

 गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…

छलक जाए ना इस दिल से कोई ग़म , 

के अक्सर यूँही हंस लिया करता हूँ ;

 टूट जाता था जिनपर आँसुओं का बाँध ,

उन जज़्बात को कस लिया करता हूँ ;

 के ख़ौफ़ नहीं अब और किसी का ,

बस फिर से मरने से डरता हूँ…

 फिर से मरने से डरता हूँ ||

 ⊗ ⊗ ⊗

इन लम्हों की बेशर्मी पे हैरां हूँ,

के चलती रही साँसें…खुद ज़िंदगी को खोकर ;

चुकाई हर हँसी की कीमत,

घंटों अंधेरे में रोकर ;

जाने ये वक़्त कैसे हर बार मात दे जाता है,

के खुद भी जलकर देख लिया…पर अंधेरा लौट ही आता है ;

पर अंधेरा लौट ही आता है ||

 ⊗ ⊗ ⊗
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