हाल-ए-दिल (4)

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इस दिल से उठती आग की चन्द लपटें


उलझनों की कशमकश में, उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ ;

ए ज़िंदगी तेरी हर चल के लिए मैं दो चल लिए बैठा हूँ ;

लुत्फ़ उठा रहा हूँ, मैं भी इस आँख-मिचोली का ;

मिलेगी कामयाबी, के हौसला कमाल लिए बैठा हूँ ;

चल मान लिया दो चार दिन नहीं मेरे मुताबिक ;

पर गिरेबान में अपने, मैं उम्र तमाम लिए बैठा हूँ ;

ये लहरें ये तूफान, तुम्हें मुबारक ;

मैं बेफ़िक्र, कश्ती और दोस्त कमाल लिए बैठा हूँ ||

Ÿ Ÿ Ÿ

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