हँसते ज़ख़्म (3)

alone man

गमगीन पलों के सन्नाटे से उठता धुआँ…

इन साँसों की बेशर्मी पे हैरां हूँ ,

के चलती ही रही… खुद ज़िंदगी को खोकर ;

चुकाई हर हँसी की कीमत, घंटों अंधेरों में रोकर ,

के जाने ये वक़्त… हर बार कैसे मात दे जाता है ;

खुद भी जलकर देख लिया, पर अंधेरा लौट ही आता है ||

♦ ♦ ♦

मुद्दतें बीती ख़ुशियों की चाह में ,

के हमने ग़म में भी मुस्कुराना सीख लिया  ;

मिला ना कांधा भी जब इन आँसुओं को ,

हमने ख़ुद को ही मनाना सीख लिया…||

♦ ♦ ♦

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