Fighting #covid19 with poetry


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Hey everyone!

I have been busy during the last few days when my family was fighting from home with the covid19 pandemic. I was on off yesterday when I realized how tough it is to stay at home with so little to do. I am sure everything you ever wanted to do, is not so tempting anymore and that’s why I am here after such a big hiatus. whereas I am itching to write new ones, we still have a long way to go. So here is a soft copy of my ebook for you all to aid you in your fight from home.

Illusions Of Inner Paint
Download here

मन मन्थन- Ebook

Also, you may browse though the blog posts to your liking. Don’t forget to share if you like it.

Stay safe and keep fighting.

The Indian Doctor

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Source here

I still have hope…

मैं कहता, मगर शर्मिंदा हूँ,

घायल हूँ, पर ज़िंदा हूँ;

 

ये उठते हाथ तो रोक भी लूँ,

पर होठों पर उनके, है निन्दा क्यूँ? [words hurt the whole community]

 

है बात बड़ी, जीवन-रक्षा,

पर भगवान नहीं, मैं इन्सां हूँ, [believe me, I’m not GOD]

 

मेरी हर कोशिश, जन-सेवार्थ,

फिर निष्ठा पे मेरी शॅंका क्यूँ? [Dedicated person in a noble profession]

 

है वक़्त-और-मौत पे किसकी चली?

फिर जीवन मेरा है दाव पे क्यूँ? [Stop violence against doctors]

 

है नसीब मुझे मरहम भी नहीं, [No support from non-medicos]

के नमक लगा, मेरे घाव पे क्यूँ? [Horrendous media coverage]

 

और कितना चोटिल होना है मुझे,

कितना लहु बहाना है? [No more attacks please]

कितने साथी खोकर अब,

सबको स्वस्थ बनाना है, [We want you safe too]

 

मैं भी एक परिवार का साया हूँ, [My family needs food, shelter etc]

खुद तपकर डिग्री लाया हूँ, [10 long years for an MD/MS]

 

मेहनत का मेरी क्यूँ मान नहीं?

मेरे हक़ का सम्मान नहीं, [My fee is what I deserve]

 

जीवन-मृत्यु से लड़ता मैं, [Saving lives at the cost of mine]

क्यूँ मेरे साथ आवाम नही? [Save the doctors]

क्यूँ मेरे साथ आवाम नही..||

Teacher’s Day

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Respected Teachers,

Heartiest congratulations on this Teacher’s day. Hope you had a great day. Wish you a lot more years of accomplishment and joy. Thank you for being there for your students. Here’s a poem dedicated to all the teachers:

है शिक्षक खङा,

है शिक्षक लङा,

वक़्त के दुर्गम काँटों से ,

अज्ञानता के सन्नाटों से ,

दिशाहीन भविष्य की राहों में ,

सपने न हों जब निगाहों में ,

है शिक्षक खङा,

है शिक्षक लङा;

 

ज्ञान के बहते सागर में ,

प्रेम से छलकती गागर में ,

उन भूली बिसरी यादों में ,

कुछ खट्टी मीठी बातों में ,

काठ की पतली सन्टी में ,

क्लास ख़त्म की घण्टी में  ,

है शिक्षक खङा,

है शिक्षक लङा;

 

नम्बर पाने की होङ में ,

कुछ कर जाने की दौङ में ,

भगवत गीता के सार में ,

कान पकड़ फटकार में ,

गिरते-पङते हालात में ,

जीत में उमङे जज़्बात में ,

है शिक्षक खङा,

है शिक्षक लङा;

 

है कार्य बङा, पर तू मत डर ,

चल चलता चल, कुछ कर गुज़र ,

है साथ तेरे सब शिक्षकगण ,

लिये ज्ञान, प्रेम और  सुन्दर मन ,

समय हो गर विपदा में पङा,

तो हाथ बढ़ा, है शिक्षक खङा ,

हाथ बढ़ा, है शिक्षक खङा …||

                         -doc2poet

बर्बरता : #HindiPoetry

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This may be happening elsewhere in the world also, but I have seen it with my own eyes around here. Have you?

कोख में घुटती सांसें ,

जन्मी बच्ची की लाशें ,

होता ममता का तिरस्कार ,

अपनों से सौतेला व्यव्हार ,

होता होगा, पर और नहीं ,

के अब वो पुराना दौर नहीं,

खुशियों को तरसती दुल्हन,

रिश्तों में बढ़ती उलझन ,

दहेज़ की बेशर्म आग,

बेबस जलता सुहाग,

रिश्तों की चोटिल कहानियां ,

लहूलुहान सुहाग की निशानियां,

होता होगा, पर और नहीं ,

के अब वो पुराना दौर नहीं,

घूरती बेहया नज़रें,

चरित्र को चीरती खबरें,

हर उम्र पे होती बर्बरता ,

मासूमियत खोती निर्मलता,

होता होगा, पर और नहीं ,

के अब वो पुराना दौर नहीं,

मैं सक्षम हूँ, मैं सबला हूँ ,

तलवार हूँ मैं, कोई डोर नहीं ,

अब और नहीं, बस और नहीं,

के अब वो पुराना दौर नहीं…||

***

                                                          -©doc2poet

 

हर नारी की व्यथा: #HindiPoetry

 

WeavingThreads_247Story of every women who rises from the ashes of her own sufferings as a beacon of light and positivity.


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मैं नारी हूँ, मैं अबला हूँ,

संघर्ष ही मेरा नसीब है;

मैं ही हूँ, बस मेरा सहारा,

दहेज, समाज; बस रक़ीब हैं;

कुचलने में  मेरे अरमान,

इन बेदर्दो को कोई  हर्ज नहीं;

हाथों की लकीरें, भी हैं  नाकाम,

मेरे हिस्से बस हिज्र सही;

जाने क्यूँ? किसने?  ये फर्क किया?

उनको सब खुशियाँ, हमें नर्क दिया !

शायद उसको  भी, है ये पता,

के मुझमें ही, गौरी-काली है ,

कब तक कर पाएंगे, मेरा दमन ?

ये रुत ही बदलने वाली है,

रुत ही बदलने वाली है…||

***

                                                             -©doc2poet