माँ : BlogchatterA2Z

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PS: This one is the closest to my heart. If you have ever liked any of my poem, you will love this one. And if you are here for the first time, the archive is on the right…

M                   अपने आँसुओं को जग की आँखों से छुपाकर पी जाना मैने बहुत पहले ही सीख लिया था | लेकिन कुछ बातें कभी नहीं छुपाई जा सकती | मेरे जीवन का सबसे दुखद लम्हा वह था जब उनका साया मेरे सर से रूठ गया | आज भी रह-रह कर वही पल अक्सर मेरी कविताओं में लौट आता है…

के  जितना था मुझसे दुलार,

करती थी जितना मुझसे प्यार;

मुझे एक बार और बाहों में भरने को,

वो  दरिया-ए-आग  मे  भी  उतरती;

होता  गर  बस  मे  उसके,

तो  चन्द  साँसें  और  ज़रूर  भरती;

अपने  लिए  न  सही,

मेरे  लिए  तो  ज़रूर  करती |

वो  रूठना, वो  मनाना ,

वो  डांट कर फिर प्यार जताना;

ऐसे  पल-दो-और-पलों  के  लिए,

वो  कुछ  भी  कर  गुज़रती;

होता  गर  बस  मे  उसके,

तो  स्वयं  काल  के  प्राण  भी  हरती;

अपने  लिए  न  सही,

मेरे  लिए  तो  ज़रूर  करती|

पर  भाग्य  की  थी  कुछ  और  ही  रज़ा,

मेरे  रंगों  मे  जैसे  कालिख  ही  भर  दी;

के  ग़म  तो  उसने  थोक  ही  दिए,

पर  ममता  केवल  फुटकर   दी;

होता  गर  बस  मे  उसके,

तो  समय  की  रेत  से  द्वंद  भी  वो  करती;

अपने  लिए  न  सही,

मेरे  लिए  तो  ज़रूर  करती,

मेरे  लिए  तो  ज़रूर  करती||

♥ ♥ ♥                                     doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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हँसते ज़ख़्म: #League of Lost Things

Indian Bloggers

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I have seen loss up close and it is something you wouldn’t wish even for your enemies. The tears I held back (at least attempted to) have found their way out through these couplets. I hope you can feel the connection:-


कभी  डूबते  का  सहारा  हुआ  करते  थे,

पर  अपनी  ही  कश्ती  में  शायद  छेद  था ;

सोचते  थे…मुट्ठी  में  सारा  जहाँ  लिए  बैठे  हैं,

जाने  कब  फिसल  गया  हाथों  से…वो  केवल  रेत  था ||

♥ ♥ ♥

इन  साँसों  की  बेशर्मी  पे  हैरां  हूँ ,

के  चलती  ही  रही… खुद  ज़िंदगी  को  खोकर ;

चुकाई  हर  हँसी  की  कीमत, घंटों  अंधेरों  में  रोकर ,

के  जाने  ये  वक़्त… हर  बार  कैसे  मात  दे  जाता  है ;

खुद  भी  जलकर  देख  लिया, पर  अंधेरा  लौट  ही  आता  है ||

♥ ♥ ♥

उन्हें  भूल  पाना  अब  मुमकिन  नहीं ,

के  ये  कोमल  एहसास  ही…साँसों  का  सहारा  बन  गया ;

साहिलों  से  नाता  टूटे  ज़माना  हो  चला,

के  उफनते  इस  सागर  में…ये  तिनका  ही  किनारा  बन गया ||

♥ ♥ ♥

छलक  जाए  ना  इस  दिल  से  कोई  ग़म , के  अक्सर  यूँही  हंस  लिया  करता  हूँ ;

 टूट  जाता  था  जिनपर  आँसुओं  का  बाँध ,उन  जज़्बात  को  कस  लिया  करता  हूँ ;

 के  ख़ौफ़  नहीं  अब  और  किसी  का , बस  फिर  से  मरने  से  डरता  हूँ ||

♥ ♥ ♥

आँसुओं  को  यूँ  बदनाम  न  कर,

के  मायूस  दिल  को  इन्हीं  से  क़रार  आता  है ;

पलकों  के  बाँध  तले  छुपाता  है  हर  ग़म,

और  छलक  भर  जायें…तो  दिल  हल्का  हो  जाता  है ||

♥ ♥ ♥

मुद्दतें  बीती  ख़ुशियों  की  चाह  में ,

के  हमने  ग़म  में  भी  मुस्कुराना  सीख  लिया  ;

मिला  ना  कांधा  भी  जब  इन  आँसुओं  को ,

हमने  ख़ुद  को  ही  मनाना  सीख  लिया ||

♥ ♥ ♥

This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda. This week’s WOW prompt is – ‘League of Lost Things’.

Don’t forget to quote your favorite one. Your feedback is what keeps me going. Thank you:-)

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