Poetry is born…

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कैसे  न  लिखूं  ?


चाँद  सा  धवल  ये  काग़ज़,

बेचैन  लहरों   सी  मचलती  स्याही,

कैसे  ना  उठे  लफ़्ज़ों  का  तूफान,

हो  जायें  गर  ये  एक,

जैसे  रूह   को  मिल  गया  हो  इलाही ||

***

I learned a new word recently  (pronounced ‘Mu-ang-ta’) & I loved it. Hope you like it too:-)

कौन हूँ मैं ? #KnowYourself

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देखा  मैने  आईना, तो  वीराने  में  भी  शजर  पाया ,
मैने  वही  लिखा,  जो  मुझे  इन  आँखों  में  नज़र  आया…||

पाँव  ज़मीं  पर  नहीं  मेरे,  

के  इन  बादलों  पे  सवार  हूँ  मैं, 

के  मैं  हूँ, और  मेरी  तन्हाई,

और  इस  ज़माने  के  पार  हूँ  मैं,

बेफ़िक्र  हूँ, बेखौफ़  हूँ,

के  मद्धम  जलती  अंगार  हूँ  मैं, 

मैं  किल्कारी, मैं  आँसू  भी,

के  दामन  से  छलकता  प्यार  हूँ  मैं,

मैं  मुश्किल  हूँ, मैं  आसां  भी,

कभी  जीत  हूँ  तो, कभी  हार  हूँ  मैं,

उलझनों  की  इस  कशमकश  में,

उमीदों  की  ललकार  हूँ  मैं,

लुत्फ़  उठा  रहा  हूँ, हर  मुश्किल  का,

के  भट्टी  में  तपती  तलवार  हूँ  मैं,

ये  लहरें  ये  तूफान, तुम्हें  मुबारक,

के  कश्ती  नहीं  मझधार  हूँ  मैं,

मैं  मद्धम  हूँ, मैं  कोमल  हूँ,

और  चीते  सी  रफ़्तार  हूँ  मैं, 

के  दर्दभरी  मैं  चीखें  हूँ,

और  घुँगरू  की  झनकार  हूँ  मैं,

मैं  निर्दयी  हूँ, मैं  ज़ालिम  हूँ ,

के  मुहब्बत  का  तलबगार  हूँ  मैं, 

मैं  शायर  हूँ, मैं  आशिक़  भी,

इस  प्रेम-प्रसंग  का  सार  हूँ  मैं,

तुम  मुझसे  हो, मैं  तुमसे  हूँ,

झुकते  नैनों  का  इक़रार  हूँ  मैं, 

मैं  गीत  भी  हूँ, मैं  कविता  भी,

के  छन्दो  में  छुपा, अलंकार  हूँ  मैं,

मैं  ये  भी  हूँ, मैं  वो  भी  हूँ,

के  सीमित  नहीं  अपार  हूँ  मैं, 

के  सीमित  नहीं  अपार  हूँ  मैं ||

 ***

I penned this one long back in an attempt to define my own self and I hope It lives up to this prompt.  This post has been written for Indispire Edition 132No one knows you better than yourself…. Peep into your heart and describe yourself in one sentence #Knowyourself .

 

मैं संगीत हूँ: #MusicBringsLife

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संगीत की कहानी, संगीत की ज़ुबानी 


बारिश की पहली फुहार, चिड़ियों का गीत मल्हार,

के दरख़्तों की इस हरियाली में, महकता कहीं मैं भी हूँ,

वन में होती हल-चल, और  बहता  पानी  कल-कल,

के असीम  सागर की इन  लहरों में, छलकता कहीं मैं भी हूँ,

भीड़ में होता शोर, और पतंग की कटती डोर,

के घड़ी के काँटों की  इस  रफ़्तार में, थिरकता कहीं मैं भी हूँ,

बीते पल अनमोल, दो प्यार के मीठे बोल,

के इन लबों पे खिलती हँसी में, शामिल कहीं मैं भी हूँ,

गर सुन कोई सके, तो गाती ख़ामोशी भी है यहाँ,

के इस कायनात के हर ज़र्रे को, इस धुन में सजाता मैं ही हूँ,

संगीतमय बनाता मैं ही हूँ , संगीतमय बनाता मैं ही हूँ ||

***

This post is written for Indispire Edition 104: No one can hate music as it uplifts your mood accordingly. Which genre or one is your favourite? You can dediacte the post to a form or an artist too. #MusicBringsLife

राज़-ए-दिल: #NobodyKnows

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दफ़्न  रह  जाने  दो  कुछ  राज़  इस  दिल  में,

के  हर  दास्तान  को  यहाँ  ज़ुबान  नहीं  मिलती,

यूँ  तो  नवाज़ा  है  कई  हुनर  से  उस  ख़ुदा  ने,

पर…हर  ख़ूबी  को  यहाँ  पहचान  नहीं  मिलती,

टिमटिमाते  हैं  इरादों  के  सितारे…उँचे  आसमानों  में,

पर  कुछ  ख़्वाबों  को  यहाँ  उड़ान  नहीं  मिलती,

कुछ  होठों  की  हँसी  का  हाफ़िज़  ख़ुदा  होता  है,

 तो  कुछ  लबों  को  यहाँ  मुस्कान  नहीं  मिलती,

बनते  हैं  कुछ  कदम  बस  दुर्गम  पहाड़ों  के  लिए,

के  सबको  यहाँ  राहें  आसान  नहीं  मिलती,

के  बता  तो  दूँ   छुपा  क्या  है  इस  दिल  में,

पर…हर  कतरे  को  यहाँ  ख़्वाहिश  तमाम  नहीं  मिलती  ||

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This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda. This week’s WOW prompt is – ‘Nobody Knows That I…’.

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पहला प्यार: #FirstCrush

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तकते  थे  राह  उनकी, के  यादों  की  कशमकश  में  यूँही  ग़ज़ल  बन  गयी,

इस  दिल  में  उठा  एक  ख़याल, और  मुश्किल  ख़ुद  हल  बन  गयी ||

मेरे पहले प्यार का बीज तब अंकुरित हुआ

जब उन्होंने पहली बार मेरे ख़्वाबों के दरवाज़े पर दस्तक दी,

उन ख़ूबसूरत पलों को शब्दों में कुछ इस तरह तराशा है…


पहला प्यार पहला एहसास 

ख़यालों ने  उनके  सताया  है  इस  क़दर,  के  राबता  हो  उनसे….तो  पूछेंगे  ज़रूर ,

के तराशा  है  तुम्हें  खुद  उस  ख़ुदा  ने,  या  हो  तुम  परी….या  कोई  हूर ;

है  तुमसे  ही  धड़कन  इस  दिल  की,  और  तुम्ही  से  इन  आँखों  का  नूर ,

के  मर  ही  मिटा  तुमपर, तो  इस  दिल  का  क्या  क़सूर ;

इस  दिल  ने  ही  दिखाई  अंधेरों  में , नज़रों  को  राहें  तमाम  हैं,

माना  हुई  है  इससे  ख़ता,   पर  क़ुबूल  हमें  भी  ये  ख़ूबसूरत  इल्ज़ाम  है ;

न  जाने  हुआ  ये  कैसे ,   के  एक   ही   झलक  में  दिल-ओ-जान  गवाँ  बैठे,

अजनबी  हुए  ख़ुद  से,  और  उन्हे  भगवान  बना  बैठे ;

जादू  चला  उनका  कुछ  इस  तरह , के  हम…रहे  नहीं  हम,

मिल  जाए  पर उनका   साथ  अगर ,   तो  ख़ुद  को  खोने  का  भी  न  हो  ग़म ;

के उनकी  नज़रों  में छलकती अपनी  तस्वीर  सा  नशा, किसी   पैमाने   में  कहाँ ,

के  मुहब्बत  की  इस  बेखुदी  सा   मज़ा, होश  में  आने  में  कहाँ ;

बयाँ  कर पाना मुम्किन नहीं ,  के   बीते  कैसे  बरसों… इन  नज़रों  की  तलाश  में,

ज़िंदा  होने  के  इल्ज़ाम  तले ,  चल थी  रही  साँसें…ज़िंदगी  की  आस  में ;

के  लौ  सी   तपती  धूप  में ,   राहत…शाम  में  हमने  पाई  है ,

गुज़र  गये  झुलस्ते  मंज़र,    के  जीवन  में  शब  लौट  आई  है ;

सजदा  करूँ  मैं  पल-पल  उनका,  जो  शख्सियत  ही  ख़ुदाया  है,

के   याकता  वो  हीर,    जिसने  इस  दिल  को  सजाया  है ;

इस  दिल  को  सजाया  है, हर पल को महकाया है ||


ये इस कविता का अंत नहीं, बल्कि इस प्रेम कहानी का आगाज़ है…

This post is written for Indispire Edition 101: First Crush is special. Isn’t it? It must have been on a teacher, an actor, a classmate, a friend, a neighbor or just a random stranger. Share the beautiful memories of your first crush with us.#firstcrush .