ऊँ शांति: (2)

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आध्यात्म की गहराइयों में भटकता बावरा मन…

मुकम्मल  जहाँ  की  तलाश  में,

फिरते  रहे  मारे-मारे ;

कैसे  मिले…जो  खोया  ही  नहीं,

हर  पल  पास  है  हमारे ; 

बस  आँखें  बंद  करने  की  देरी  है,

और  जी  उठेंगे  दिलकश  नज़ारे ;

के  लड़खड़ाते  ये  कदम  अपनी  राह  ढूंड  ही  लेंगे,

कभी  यादों  की  भीड़  में…कभी  तन्हाई  के  सहारे ||

ψ ψ ψ

ख़्वाहिश  भर  से  अंजाम  मिला  नहीं  करते,

के  हर  ख़्वाब  को  परवान  चढ़ाना  पड़ता  है ;

अंधेरे  को  कोसकर  किसने  क्या  पाया  है,

के  अपना  दीपक  ख़ुद  ही  जलाना  पड़ता  है ||

ψ ψ ψ

ऊँ शांति: शांति:

ऊँ शांति: (1)

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आध्यात्म की गहराइयों में भटकता बावरा मन…

तैरने चले थे दरिया में,

बीच रस्ते बरसात हो गयी,

के ढूँढने निकले थे ख़ुदा को,

और ख़ुद से मुलाक़ात हो गयी ||

∞ ∞ ∞

करके फ़रियाद जाने क्यूँ उसे शर्मिंदा किया करते हैं,

ख़बर जिसे हर राज़-ए-दिल की है,

के हर कामयाबी चूमेगी ख़ुद ही कदम,

गर हम उनके क़ाबिल भी हैं  ||

∞ ∞ ∞

ऊँ शांति: शांति: