लहरें : BlogchatterA2Z

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L               एकांत में साहिल पर बैठकर आती-जाती लहरों की कल-कल को सुनने और डूबते हुए सूरज को टकटकी लगाकर देखने से ज़्यादा शांति देने वाली और कोई जगह शायद इस जहाँ में ही नही है | हाल ही में गोआ के केंडोलिम बीच पर एक हसीन शाम में ये पंक्तियाँ काग़ज़ पर स्वयं ही उतर आईं |

इन किनारों पर हर सवाल का जवाब छुपा है…

प्यासी  रेत  को  सताती  ये  लहरें,

किरणों  की  चादर  ओढ़े  थिरकती  लहरें,

जाँबाज़ों  की  पतवार  तले  उफनती  लहरें,

सुरमई  सूरज  को  आगोश  में  भरती  लहरें,

सोए  किनारों  को  जगाती  लहरें,

डूबी   यादें  तटों  तक  लाती  लहरें,

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जाने  क्यूँ  बेचैन  सी  रहती  हैं  ये ?

जाना  कहीं  नहीं   पर  निरन्तर  चलती  लहरें,

गाती  गुनगुनाती  लहरें,

 गुस्से  में  शोर  मचाती  लहरें,

कुछ  याद  दिलाती  लहरें,

सब  कुछ  भुलाती   लहरें,

कुछ है दिल में जो बताती नहीं, 

अनजाने ही, सब कुछ कह जाती लहरें,

के ये आईना हैं हर एक दिल का,

हर राज़ जताती लहरें,

ये ख़्वाब सजाती लहरें,

ये राह दिखाती लहरें ||

♥ ♥ ♥                                       doc2poet

अगर आपको मेरी कविताएँ पसन्द आयें तो मेरी पुस्तक “मन-मन्थन : एक काव्य संग्रह” ज़रूर पढ़ें| मुझे आपके प्यार का इन्तेज़ार रहेगा |

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14 thoughts on “लहरें : BlogchatterA2Z

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